अध्याय 3 मिरर इमेज

मैंडी हैरिसन के पास खड़ी होकर धीमे स्वर में बोली, “हैरिसन, तुम्हें कंपनी में अपना काम संभालने जाना चाहिए। मैं यहीं रुककर लिली का ध्यान रखूँगी। जैसे ही डॉ. जॉनसन बाहर आएँगी, मैं उनसे कहूँगी कि वे इसे देख लें।”

ज़रूरी काम सिर पर होने की वजह से हैरिसन जल्दी निकलना चाहता था। कुछ पल सोचने के बाद उसने मैंडी की बात मान ली और लिली को उसकी देखरेख में छोड़कर, सायमन और अपनी टीम के साथ रवाना हो गया।

उधर मैंडी लिली के साथ वहीं रुकी रही और ऑपरेशन थिएटर के बाहर इंतज़ार करने लगी।

ऑपरेशन थिएटर के अंदर सर्जरी चल रही थी—एलेना और नेथन पूरी तरह अपने काम में तल्लीन थे।

छोटा कॉनर, लैपटॉप पकड़े, तेज़ी से टाइप कर रहा था और साथ ही मिया से बात कर रहा था, जो मोबाइल पर गेम खेल रही थी।

“मिया,” कॉनर ने कहा, “मम्मी ने कहा हमारी बहन यहीं पाइनवुड सिटी में है। मैं उसे कैसे ढूँढ़ूँ?”

मिया की नज़रें गेम पर टिकी थीं; उसने बस एक झलक कॉनर पर डाली।

“कॉनर, तुम तो दुनिया के सबसे छोटे हैकर बनने का दावा करते हो ना? किसी को ढूँढ़ना तुम्हारे लिए मुश्किल नहीं होना चाहिए। और वो हमारी ट्रिपलेट है, तो शक्ल भी हमारी जैसी ही होगी। क्यों न तुम बिग-डेटा से तुलना चला लो? शायद उसी से उसका पता चल जाए।”

मिया की सलाह से कॉनर में जैसे नई ऊर्जा आ गई।

उसने उसकी तारीफ़ की। “मिया, तुम कितनी स्मार्ट हो!”

मिया हल्का-सा शरमाकर मुस्कुराई और फिर से पूरी तन्मयता से गेम खेलने लगी।

गेम में उसने दूसरे खिलाड़ी को हुक्म दिया, “डरपोक! जल्दी से ‘द बॉस’ के पीछे-पीछे आ! मैं तुम्हें बचाऊँगी।”

वाकई, गेम में मिया का यूज़रनेम “The Boss” था। कॉनर, जो लैपटॉप पर टाइप किए जा रहा था, समझ ही नहीं पा रहा था कि पाँच साल की बच्ची में दूसरों को खुद को “द बॉस” कहलवाने का इतना साहस कैसे है।

क्या सिर्फ इसलिए कि वो गेमिंग में अच्छी थी?

ज़ैंडर के पिता की सर्जरी जटिल थी और कई घंटे लगने वाले थे।

कॉनर और मिया ऑपरेशन थिएटर के बाहर वेटिंग एरिया में बैठे रहे—दोनों अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त। उम्र भले छोटी थी, पर वे कब के अपनी माँ की भागदौड़ भरी दिनचर्या के आदी हो चुके थे।

उसी समय लिली भी ऑपरेशन थिएटर के बाहर बैठी थी, और अपने बगल में बैठी मैंडी को सहमी-सहमी नज़रों से देख रही थी।

मैंडी अपने फोन में खोई हुई थी, जैसे किसी से चैट कर रही हो।

लिली ने उसे परेशान करने की हिम्मत नहीं की और बस धीमे से पुकारा, “मम्मी।”

पहली बार मैंडी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

लिली ने थोड़ा ऊँचा बोलकर फिर पुकारा, “मम्मी।”

लिली की आवाज़ सुनते ही मैंडी झुँझलाकर पलटी।

“क्या हुआ तुम्हें? ऐसे बोल रही हो जैसे भूत बुला रही हो। कुछ कहना है तो साफ़-साफ़ कहो। यूँ पुकारना बहुत चिढ़ाने वाला है।”

डाँट पड़ते ही लिली सिमट गई। उसने घबराकर अपना पेट पकड़ा और डरते-डरते मैंडी से पूछा।

“मम्मी, मेरे पेट में दर्द हो रहा है। मुझे सच में बाथरूम जाना है। क्या आप मेरे साथ चल सकती हैं, प्लीज़?”

लिली की बाथरूम साथ चलने की बात सुनते ही मैंडी का चेहरा पल भर में बदल गया। ये क्या मतलब—कि वो चाहती है मैंडी साथ जाए और उसे साफ़ भी करे?

मैंडी की भौंहें तन गईं।

उसने लिली को डाँटा, “लिली, तुम पाँच साल की हो गई हो। बाथरूम खुद नहीं जा सकती? मुझे साथ क्यों चाहिए? तुम क्या सोच रही हो? प्री-स्कूल में टीचर्स ने तुम्हें नहीं सिखाया? मैं इससे तंग आ चुकी हूँ! तुम तो बस परेशानी ही परेशानी हो।”

लिली पहले से ही डरपोक थी और मैंडी से घबराती रहती थी। डाँट पड़ते ही वह रोने लगी, आँसू तुरंत ढुलकने लगे।

“मैं, मैं, मैं…” वह हकलाती रही, पूरा वाक्य ही नहीं बना पाई।

लिली की हालत देखकर मैंडी की चिढ़ और बढ़ गई।

“दिन भर बस रोती ही रहती हो, जैसे मैंने तुम्हारे साथ कोई बहुत बड़ा ज़ुल्म कर दिया हो। ठीक है, अब बाथरूम खुद जाओ। अगर तुम्हारी आँख से एक भी और आँसू निकला न, तो थप्पड़ पड़ेगा—समझी? रोना बंद करो।”

यह कहकर मैंडी ने लिली की बाँह पकड़ ली और उसे लगभग घसीटते हुए बाथरूम की तरफ ले गई। उसने लिली को झटके से खींचा; उसकी छोटी-सी बाँह पर तुरंत नीला-पीला निशान पड़ने लगा।

बाँह में दर्द था, मगर पिता पास नहीं थे, इसलिए लिली कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर सकी।

वह होंठ काटकर चुपचाप मैंडी के साथ बाथरूम तक चली गई।

बाथरूम के दरवाज़े पर मैंडी ने लिली को अंदर धकेल दिया। फिर उसने फोन निकाला और दोबारा उसी में लग गई।

“जल्दी कर। मुझे ज़्यादा देर इंतज़ार मत कराना। वरना कोई उठाकर ले गया न—तो भुगतना पड़ेगा।”

मैंडी का लहजा समझकर लिली ने अब उसे और परेशान करने की हिम्मत नहीं की। वह संभल-संभलकर अंदर बढ़ी।

लिली जन्म से ही कमज़ोर थी। एक साल की होने से पहले ही उसे दिल की गंभीर बीमारी का पता चला था। इसी वजह से फ्रॉस्ट परिवार में हर कोई लिली का बहुत ध्यान रखता था।

यहाँ तक कि लिली जब बाथरूम जाती, तो भी कोई साथ चलता—पैंट ऊपर करने में मदद करने के लिए—डर रहता कि ज़रा गलत तरीके से झुकी तो दिल पर दबाव पड़ सकता है और नुकसान हो सकता है।

इतनी बारीकी से देखभाल में लिली की खुद की कुछ काम करने की आदत कम रह गई थी। और वह अपनी उम्र के बच्चों के मुकाबले थोड़ी नाटी भी थी।

लिली लड़खड़ाते कदमों से महिलाओं के बाथरूम में गई और बड़ी मुश्किल से एक केबिन का दरवाज़ा धकेलकर खोला।

उसी वक्त मिया, जो मोबाइल गेम खेल रही थी, ज्यादा पानी पी लेने के बाद उसे भी बाथरूम जाना पड़ा।

इत्तफाक से, जिस रेस्ट एरिया में वह और कॉनर थे, वहाँ से एक दूसरा रास्ता भी था जो सीधे बाथरूम तक जाता था।

मिया ने फोन नीचे रखा, कॉनर से कहकर, सीधी बाथरूम की तरफ चली गई।

अंदर कदम रखते ही उसकी नज़र एक छोटी-सी लड़की पर पड़ी—जो उससे भी थोड़ी नाटी थी—और आँखों में आँसू लिए पैंट ऊपर खींच रही थी।

मिया उस बच्ची को देखती रह गई। उसके चेहरे में कुछ ऐसा था… जो उसे खुद जैसा लग रहा था।

नहीं, सिर्फ जाना-पहचाना नहीं—हैरतअंगेज़ हद तक वही।

मिया को लगा जैसे वह आईने में खुद को देख रही हो। और लिली भी मिया को देखकर उतनी ही उलझन में पड़ गई।

दोनों एक-दूसरे के सामने खड़ी, सकपकाई हुईं।

और भी अजीब इत्तफाक यह था कि उस दिन दोनों ने एक जैसी पोशाक पहन रखी थी—सफेद शर्ट, लंबे पैंट, और एक-सी बन की हेयरस्टाइल। यहाँ तक कि रंग-रूप भी एक जैसा था।

मिया का दिमाग तेज़ी से चलने लगा। क्या यह उनकी खोई हुई बहन हो सकती है?

लेकिन यह तो मिया से भी छोटी लग रही थी।

नहीं, उसे पूछना ही होगा कि मामला क्या है।

मिया ने हाथ बढ़ाकर लिली का हाथ पकड़ा और उसे खींचकर बाथरूम के आईने के सामने ले गई। आईने में उनके एक-से चेहरों की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा, “हम दोनों बहुत एक जैसी लगती हैं, है न?”

लिली ने सिर हिलाया। “हाँ।”

“तो… क्या हम बहनें हो सकती हैं?”

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